MAHARISHI DAYANAND ON NATIONAL DEFENCE

राष्ट्र रक्षा में महर्षि दयानंद
ब्रिगेडियर चितरंजन सावंत, वी एस एम
एक समाज सुधारक संन्यासी स्वदेश सुरक्षा के बारे में चिंतन करें, और अपने विचारो को अपनी पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश में लिपिबद्ध करें, यह बात रक्षा विशेषज्ञों के गले नहीं उतरती। किंतु दयानंद सरस्वती के विचारों को पढने के बाद संशय के बादल छटनें लगते हैं और ज्ञानरूपी सूर्य से अज्ञान का अंधेरा दूर हो जाता है।
उस महान पुस्तक का छठा समुल्लास स्वदेश सुरक्षा के सूक्तो से सैनिक और असैनिक का समान रूप से ज्ञान वर्धन करता है। यू तो यह अध्याय राज धर्म से संबंधित है किंतु हम यह कह सकते हैं कि स्वराष्ट्र सुरक्षा राष्ट्र सचालन का और राज धर्म का अभिन्न अंग है।
यह कहना उचित होगा कि स्वदेश सुरक्षा, स्वराष्ट्र के जन जन का धर्म है और इस महान दायित्व का वहन नर और नारी को समान रूप से आजीवन करना है। अपने जीवन यापन में हम किसी भी व्यवसाय से क्यों न जुड़े हों, व्यवसाय की खातिर राष्ट्र रक्षा के दायित्व से विमुख होना आत्म हत्या करने के समान होगा।
आम आदमी की भूमिका
इतिहास साक्षी है कि अनेक युगो में राष्ट्र रक्षा के महान कार्य में आम आदमी नें बहुत ही कम रूचि ली। मध्य युग से भारत में अंग्रेजो के शासन काल तक विदेशी आक्रमण कारी लगातार आते रहे, तत्कालीन सीमा वर्ती छोटे छोटे राजा उनसे अपने स्तर पर जूझते रहे किंतु सामान्य जन युद्ध की गतिविधियों से विरक्त रहे। वे अपना अपना व्यवसाय चलाते रहे और उन्होने सामाजिक और आर्थिक स्तर पर विदेशी सेनाओ का विरोध नहीं किया। रणभूमि में विदेशी आक्रमणकारियों से क्षत्रिय वर्ग जूझता रहा, युद्ध होते रहे किंतु किसान अपना खेत जोतता रहा, बनिया तराज़ू तोलता रहा, विद्यार्थी पुस्तक पढ़ता रहा और शिक्षक पढ़ाते रहे और केवल राजाओं के वेतन भोगी सैनिक विदेशियों के नए हथियारो का अपनी पुरानी शैली से सामना करते रहे, हारते रहे और राजा सत्ता खोता रहा।
कुछ ही घंटो के युद्ध में देश के शासन की बागडोर भारतीयों के हाथ से निकल कर विदेशियों के हाथों में जाती रही।
पृथवीराज चौहान मौहम्मद गौरी की सेनाओं की प्रतीक्षा दिल्ली के निकट तराईन के मैदान में करता रहा, उसने पंजाब की ओर आगे बढ़ कर स्थानीय लोगो के सहयोग से विदेशी आक्रमणकारी के कुछ अंगो पर घात लगाकर हमला नहीं किया। देश के अन्य राजाओं का सहयोग भी नहीं प्राप्त किया। अनेक व्यवसायों में लगे भारतवासियों को शस्त्र की शिक्षा देकर रणभूमि में नही उतारा।
कोउ नृप होय हमें का हानि – इस नीति नें विनाश कारी परिणाम हमारे सामने रख दिए। पृथवीराज चौहान की हार ने हमारे धर्म पर, संस्कृति और मनोबल पर ऐसा कुठाराघात किया कि आहत भारत को स्वस्थ होकर रणभूमि में विदेशियो से दो दो हाथ करने में कई शताब्दियां बीत गई।
स्वामी दयानंद सरस्वति ने निर्बल शरीर की नब्ज़ पर हाथ रख कर यह जाना और पहचाना कि जब तक संपूर्ण देश एकजुट होकर विदेशियों का मुकाबला नहीं करेगा तब तक हमारी हार होती रहेगी। स्वदेश सुरक्षा का भार केवल क्षत्रियों के कंधो पर नहीं रखा जा सकता। यदि ब्राह्मण केवल पूजा पाठ में तल्लीन रहेंगे, वैश्य केवल व्यवसाय के लाभांश पर ही ध्यान केंद्रित करेंगे और शत्रु को पराजित करने के लिए शूद्रो को भी शस्त्र संचालन की शिक्षा नही देंगे तो रण भूमि में पराजय अवश्य होगी।
जन जन देश का रक्षक है। जन जन सैनिक है। जन जन को शस्त्र संचालन आना चाहिए। और सभी जन नायकों को सेना नायको के समान रणनीति की शिक्षा लेनी चाहिए।
यह पहली बार ऐसा हुआ कि स्वामी दयानंद सरस्वती जैसे संन्यासी नें दुखती हुई रग को पहचाना और इस निर्बलता को सबलता में बदलने के लिए सक्रीय कदम उठाए।
शस्त्र और शास्त्र दोनो की ही शिक्षा महत्वपूर्ण है और इस पर समान रूप से बल दिया जाना चाहिए। स्वामी दयानंद ने यह स्पष्ट रूप से लिखा कि सेना नायक को बहुत ही शांत मन से, बिना क्रोध के, रणभूमि की स्थिति का आंकलन करना चाहिए और शत्रु को हराने के लिए रणनीति बनानी चाहिए।
यदि शत्रु शक्तिशाली है और हम निर्बल हैं तो हमें हमें रणभूमि से खरगोष अर्थात ससा के समान दूर जाकर उस अवसर की प्रतीक्षा करनी चाहिए जब सैन्य शक्ति का संचय कर के हम शत्रु से अधिक शक्तिशाली बन कर उस पर हमला कर सकें।
छत्रपति शिवाजी महाराज ने इसी रणनीति का पालन किया और मुगलों को तथा आदिलशाही राज्यो की सेनाओं को अलग अगल पराजित किया।
पराजय से विजय
हमें कभी भी पराजय से भयभीत नहीं होना है। और अवसर की ताक में सदैव रहना चाहिए। स्वामी दयानंद ने वन्य पशु चीता का उदाहरण दिया। चीता दबे पांव आगे बढ़ता है और अवसर मिलते ही छलांग लगाकर शिकार करता है। रणभूमि में भी हमें अवसर की ताक में रहना है। अवसर का लाभ उठा कर शत्रु को पराजित कीजिए। विजय पाने के लिए मनोबल का प्रमुख स्थान है. यदि हम अपने मनोबल को धर्म के आधार पर ऊंचा उठाते रहें तो शत्रु को पराजित करने में सुविधा होगी। मनुस्मृतिं के आधार पर स्वामी दयानंद ने लिखा कि पराजित शत्रु की महिलाओं का निरदर कभी नहीं करना चाहिए और कभी भी उनका शोषण नहीं करना चाहिए। यदि पराजित शत्रु की महिलाओ और बच्चो की देखभाल हमारी विजयी सेना करती है तो हमारा मनोबल ऊंचा होता है और शत्रु हथियार डालने को तैयार रहता है।
कहते हैं कि सेना सेना पेट के बल आगे बढ़ती है अर्थात सैनिक का भरण पोषण सेना नायक और राजा भलिभांति करते हैं तो वह सेना शत्रु को पराजित करनें में सफल होती है । मनुस्मृति के अनेक श्लोको से शिक्षा लेते हुए हमें अपनी सेना को सबल बनाते रहना चाहिए और शत्रु को पराजित करने में कोई कसर नहीं छोड़नी चाहिए।

ब्रिगेडियर चिंतरंजन सावंत
aumchitranjansawant@gmail.com

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About vedicupvan

AUM. I AM 82 YEARS OLD AND BY THE GRACE OF ISHWAR AND GOOD WISHES OF LOVED ONES AM ENJOYING GOOD HEALTH. I AM A RETIRED ARMY BRIGADIER AND HAD HUNG MY SPURS MORE THAN A QUARTER OF A CENTURY AGO. I AM A MEDIA COMMENTATOR AND HAVE BEEN DOING RUNNING COMMENTARY ON THE REPUBLIC DAY PARADE AT RAJPATH NEW DELHI AND INDEPENDENCE DAY CEREMONY AT THE RED FORT FOR OVER FOUR DECADES. I AM HAPPILY MARRIED. OUR TWO DAUGHTERS AND A SON ARE WELL SETTLED IN LIFE. NOW I TRAIN THE NEW GENERATION IN THE ART OF PUBLIC SPEAKING.
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2 Responses to MAHARISHI DAYANAND ON NATIONAL DEFENCE

  1. vedicupvan says:

    Reblogged this on vedicupvan and commented:

    AUM
    UNIFIED COMMAND IS A MUST FOR PROPER RUNNING OF A BATTLE ESSENTIALLY A WAR. COMMAND AND CONTROL MUST NOT BE DILUTED OTHERWISE SOLDIERS WOULD RUN HELTER SKELTER NOT KNOWING WHAT TO DO AND WHAT NOT TO DO.

  2. vedicupvan says:

    AUM
    I WISH TO LET READERS KNOW THAT I AM 84 YEARS OLD NOW AND RUNNING IN THE 85TH YEAR. THANKS.

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