MANURBHAV SAY THE VEDAS: BY SUDHA SAWANT

 

AUM

              मनुर्भव

वेद हमें बारंबार सिखाते हैं ,प्रेरणा देते हैं—मनुष्य बनो .जब जब मैं वेद मंत्रों का स्वाध्याय पूर्वक अर्थ समझने का प्रयत्न करती हूं तो वैदिक ऋषियों के ज्ञान से ,विषय को समझाने के उनके ढंग से अधिकाधिक प्रभावित होती हूं नत मस्तक हो जाती हूं .

हम मानते हैं कि वेदों में दिया गया ज्ञान ईश्वर प्रदत्त है  जब जब ऋषि जीवन के किसी गूढ़ रहस्य को जानने के लिए ध्यान में लीन हुए तो जो रहस्य, जो सत्य उनके हृदय में प्रकाशित हुआ वह ईश्वर प्रदत्त था। इसलिए हम मानते हैं कि यह ऋषि मंत्र दृष्टा हैं। हमारे वेद चार हैं ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्व वेद और इनके ऋषि हैं अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा। आज मैं जिस मंत्र के अर्थ को जानकर अभिभूत हूं वह ऋग्वेद का मंत्र है – जिसमें वेद माता हम प्राणियों को सही अर्थों में मनुष्य बनने की प्रेरणा दे रही है।

तन्तुम तन्वन रजसो भानुमन्विहि, ज्योतिष्मत पथो रक्ष धियाकृतान्

अनुल्वणं वयत जोगुवामपो मनुर्भव जनया दैव्यं जनम्

ऋग्वेद 10,53, 6

 

अर्थ इस प्रकार है—

 

वेदालोक में स्वामी विद्यानंद विदेह जी ने लिखा है – लोक के ताने बाने को तानता हुआ नियम पालन में सूर्य का अनुगमन कर। बुद्धि द्वारा ज्योतिर्मय पथों की रक्षा कर। उपदेश देने वालों के सार्थक कर्मों को कर, मननशील बन। दिव्य जनो को जन्म दे।

मनुष्य का समाज किस प्रकार सुचारु रूप से चले, ठीक व्यवस्था बनी रहे, प्रेम व पारस्परिक सहयोग बना रहे, समाज प्रगति पथ पर रहे, इसके लिए हर तरह की अच्छी सीख इस मंत्र में दी गई है।

अग्नि ऋषि समझा रहे है कि हे मनुष्य तू सूर्य का अनुकरण करते हुए अपने समाज को बना। जैसे सूर्य अपने प्रकाश से अपने सभी ग्रहो और उपग्रहो को प्रकाश देता है, गति देता है, और अपनी और खींचता भी है ऐसे ही तुम भी समाज के सभी लोगो को अपने अच्छे गुणों से अपने कामों से अपनी ओर आकर्षित करो।

उनकी आवश्यताओं को पूरा करने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहो, ग्रहो और उपग्रहों के पास अपना प्रकाश नहीं है सूर्य नक्षत्र है उसके पास प्रकाश है, वह चंद्रमा को भी प्रकाशित करता है, पृथ्वी को भी प्रकाशित करता है । प्रकृति की कैसी सुंदर व्यवस्था है। इसी प्राकृतिक व्यवस्था का उदाहरण देकर वैदिक ऋषि हमें समझा रहे हैं कि मनुष्य भी एक दूसरे के काम आएं ।

 

एक अन्य मंत्र में भी इसी तरह का उदाहरण देते हुए कहा है

स्वस्ति पंथामनुचरेम सूर्याचन्द्रमसाविव

पुनर्ददताघ्नता जानता संगमेमहि .

अर्थात सूर्य और चन्द्रमा के समान तुम भी कल्याणकारी मार्ग पर चलो. जैसे सौर मंडल के सभी ग्रह-उपग्रह अपनी गति से अपनी-अपनी कक्षा में सूर्य के चारों ओर चक्कर लगा रहे हैं कोई किसी की कक्षा में जबरदस्ती नहीं घुसता है व सूर्य सभी को प्रकाश देता है, ऐसे ही हे मनुष्यों तुम भी ऐसा ही व्यवहार करो .साथ ही अपने समाज में ज्ञानी लोगों के साथ और अहिंसक विचार वाले लोगों के साथ और दानियों के साथ रह कर जीवन यापन करो.

 

मानव धर्म की दूसरी बात समझाते हुए ऋषिवर कहते हैं कि ज्योतिर्मय हमारे पूर्वजों ने, मेधावी बुद्धि वाले हमारे पूर्वजों ने जो मार्ग हमें दिखाया,वह प्रकाश पूर्ण मार्ग है ,हम उस मार्ग पर चलें, उस मार्ग को अंधकार में लीन न होने दें. त्याग के ,प्रेम के परस्पर सहयोग के जो उच्च मानदण्ड हमारे पूर्वजों ने स्थापित किए हैं और मानव  मात्र का कल्याण किया है उन आदर्शों को हम न भुलाएं ।हमारे जिस त्याग के सहारे ,जिन मानव मूल्यों को स्थापित किया है हम भी प्राण-पण से उस परंपरा को बनाए रखें । मातृभूमि की रक्षा में ,स्वधर्म की रक्षा में व स्वसंस्कृति की रक्षा में जिन महान बलिदानियों ने अपने प्राणों की बाजी लगाकर हमें स्वतंत्रता प्रदान की है हम उनके बलिदानों को व्यर्थ न जाने दें।स्वयम् उन मूल्यों की रक्षा करें उन आदर्शों पर चलें व दूसरों को भी उन  पर चलने के लिए प्रेरित करें. स्वार्थ से ऊपर उठ कर मानव- कल्याण के लिए काम करने का प्रयत्न करें .।

वैदिक ऋषि तीसरे मानव मूल्य को समझाते हुए कहते हैं कि हे मानव जैसे हमारे पूर्वजों ने सरल व सत्कर्म किए, सुलझे हुए कर्म किए,हम उनका पालन करें ,उनमें आस्था  रखें। महापुरुष जैसा सोचते थे ,बोलते थे ,करते थे ,वैसा ही हम सब भी करें .।हम भी क्षुद्र स्वार्थ से ऊपर उठ कर मानवमात्र की भलाई के लिए कार्य करें.यह मानव स्वभाव भी है कि हम कुछ व्यक्तियों के उदाहरण अपने सामने रखते हैं और स्वयं भी उसी तरह से व्यवहार करना चाहते हैं ।इसी से संसार में विश्वबंधुत्व की भावना का विस्तार कर सकेंगे।इस संसार को रहने के लिए एक श्रेष्ठ स्थान बना सकेंगे । हम चाहते भी हैं—कृण्वन्तो विश्वमार्यम् ।

इस प्रकार इस मंत्र के द्वारा ऋषि हमें यह समझाते हैं कि मानव समाज निरंतर सुचारु रूप से चलता रहे ,इसके लिए सर्व प्रथम कुछ उच्च आदर्शों को हमें जीवन में अपनाना चाहिए और ये सीख हमें सूर्य चन्द्र,तारागण ,वनस्पति ,आदि से मिलती रहती है ।प्रकृति के सभी तत्व जीव मात्र  की रक्षा करने के लिए हैं और  हम मनुष्यों को यह सीख मिलती है कि हम भी सर्व भूत हितेरता की भावना से पूर्ण होकर परस्पर एक दूसरे का हित करते हुए अपना जीवन बिताएं ।

प्रकृति के साथ ही मानव जीवन में भी जिन लोगों ने श्रेष्ठकर्म किए हैं हम उन्हें आदर्श मान कर उस  पथ पर आगे बढें क्योंकि कहा भी गया है—महाजनो येन गता स पन्था ।

एक अन्य मुख्य बात यह बताई गई है कि हम श्रृंखला को बनाए रखें ।हम स्वयं भी मनुष्य बनें और अपने कार्यों से ऐसे आदर्श प्रस्तुत करें कि अन्य लोगों के लिए वे उदाहरण बन जाएं। हमअपने  सुकर्मों से अन्य लोगों को प्रेरित करके उन्हें मनुष्य बनने की प्रेरणा दें ,स्वार्थ त्याग कर परोपकार करने के लिए उत्साहित करें।उन्हें समझाएं  कि हमारे जीवन का लक्ष्य होना चाहिए—परोपकाराय सतां विभूतय। हम प्रयत्न करें कि हम अपनी सन्तानों को भी यह कहें और समझाएं।यह परंपरा निरंतर चलती रहनी चाहिए ।मनुष्य मात्र को मानवता के विषय में बताएं और कहें —

मानव सदा सानव रहे ,

उर प्रेम पारावार हो ,मन उच्च और उदार हो,

मति दृढ तथा अविकार हो

वह दुख चाहे जो सहे ,  मानव सदा मानव रहे ।

सुधा सावंत

609 सैक्टर  29 अरुण विहार नोएडा201303

 

 

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About vedicupvan

AUM. I AM 82 YEARS OLD AND BY THE GRACE OF ISHWAR AND GOOD WISHES OF LOVED ONES AM ENJOYING GOOD HEALTH. I AM A RETIRED ARMY BRIGADIER AND HAD HUNG MY SPURS MORE THAN A QUARTER OF A CENTURY AGO. I AM A MEDIA COMMENTATOR AND HAVE BEEN DOING RUNNING COMMENTARY ON THE REPUBLIC DAY PARADE AT RAJPATH NEW DELHI AND INDEPENDENCE DAY CEREMONY AT THE RED FORT FOR OVER FOUR DECADES. I AM HAPPILY MARRIED. OUR TWO DAUGHTERS AND A SON ARE WELL SETTLED IN LIFE. NOW I TRAIN THE NEW GENERATION IN THE ART OF PUBLIC SPEAKING.
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